रविवार, 6 दिसंबर 2015

माता सीता को एक गर्भवती के श्राप ने भगवान श्री राम जी से दूर कर दिया...




माता सीता को एक गर्भवती के श्राप ने भगवान श्री राम जी से दूर कर दिया...
विवाह से पूर्व सीता की महत्वाकांक्षा ने नष्ट कर दी भगवान श्री राम जी की खुशियां... वह गर्भवती कौन थी.. जिसने श्राप दिया...
धर्म हमें सच्चाई के मार्ग पर चलना सिखाता है. सनातन धर्म में दूसरों को पीड़ा पहुँचाने को पाप और परोपकार को पुण्य माना गया है. इस धर्म से जुड़ी किंवदन्तियाँ यह बताती है कि ईश्वर को भी अपनी गलती की सजा भोगनी पड़ती है.
ऐसी ही एक किंवदन्ती है जो बताती है कि दशरथ वधू माता सीता द्वारा जब किसी को तड़पाया गया तो उन्हें उसकी सजा भोगनी पड़ी थी.
इस घटना को बहुत कम लोग ही जानते हैं. किस गर्भवती को तड़पाया था माँ सीता ने? किसने दिया था माता सीता को श्राप? माता सीता को उस श्राप की कौन सी सजा मिली थी?
सीता मिथिला नरेश जनक की पुत्री थी. एक दिन उद्यान(बगीचे) में खेलते हुए कन्या सीता को एक नर व मादा तोते का जोड़ा दिखाई पड़ा. वो दोनों आपस में बातें कर रहे थे.
वो जोड़ा ये बात कर रहे थे कि भूमंडल में राम नाम का बड़ा प्रतापी राजा होगा जिसकी अत्यंत सुंदर पत्नी सीता होगी. उत्सुकता वश सीता अपने को रोक ना सकी और उनकी बातें सुनने लगी.
उन्हें अपने ब्याह के बारे में सुन अच्छा लग रहा था. इसी उमंग में उन्होंने बातचीत में मग्न तोते के उस जोड़े को पकड़वा लिया.
माता सीता उनसे अपने और श्रीराम के बारे में और भी बातें सुनना चाहती थी इसलिए उन्होंने उस जोड़े से पूछा कि उन्हें राम और उसके विवाह के बारे में ये बातें कहाँ से पता चली. तोते ने कहा कि उन्होंने ये बात महर्षि वाल्मीकि के मुख से उनके आश्रम में शिष्यों को पढ़ाते वक्त सुनी.
इस पर माता सीता ने कहा कि ‘’तुम जनक की जिस पुत्री के बारे में बात कर रहे हो वो मैं ही हूँ. तुम्हारी बातें मुझे रोमांचित कर रही है इसलिए अब मैं तुम्हें तब छोड़ूँगी जब मेरा विवाह श्रीराम से हो जाएगा.’’
तोते ने याचना करते हुए कहा कि ‘’हे देवी! हम पक्षी हैं जिसे घर में सुख नहीं मिल सकता है. हमारा काम ही आसमान में विचरण करना है.’’ माता सीता ने नर तोते को आज़ाद कर दिया और कहा कि ‘’ठीक है तुम सुखपूर्वक विचरो, परंतु तुम्हारी पत्नी को मैं तब छोड़ूँगी जब मुझे राम प्राप्त हो जाएँगे.’’
नर तोते ने फिर गिड़गिड़ाते हुए कहा हे सीते मेरी यह पत्नी गर्भ से है. मैं इसका वियोग सह ना पाऊँगा. कन्या सीता ने फिर भी मादा तोते को नहीं छोड़ा. इस पर क्रोध में आकर मादा तोते ने सीता को श्राप दिया कि ‘’जैसे तू मेरी गर्भावस्था में मेरे पति से मुझे दूर कर रही है उसी प्रकार तुझे भी अपनी गर्भावस्था में अपने राम का वियोग सहना पड़ेगा.’’
इतना कहते ही मादा तोते ने प्राण त्याग दिया. कुछ समय बाद उसके वियोग में व्यथित नर तोते ने भी अपने प्राण त्याग दिए. सालो बाद इसी श्राप के कारण ही माता सीता को श्रीराम ने उनकी गर्भावस्था के दैरान ही वन में भेज दिया था.
भमावत 
थूर, उदयपुर , मेवाड़
मो. 0917891529862

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

मंदिरों में रोजाना सुबह और शाम आरती के बाद भगवान का चरणामृत दिया जाता है।
चरणामृत का पानी हमेशा तांबे के बर्तन में रखने का विधान है, क्योंकि आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे में बहुत सारी बीमारियों को खत्म करने की ताकत होती है। इसका पानी स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।
इसमें तुलसी डालने के पीछे यह मान्यता है कि तुलसी का पत्ता महाऔषधि है। इसमें न केवल बीमारियों को खत्म करने के गुण होते हैं, बल्कि कीटाणुओं को मारने की शक्ति भी होती है।
जिन्हें भगवान मे पूरी श्रृद्धा और विश्वास होता है। उनके लिए इस पानी का सेवन अमृत जैसा गुणकारी होता है।
संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है
पद पखारि जलपान करि,आपु सहित परिवार।
पितर पार करि प्रभुहिं पुनि,मुदित गयउ लै पार।।
यानी भगवान श्रीराम के चरण धोकर और उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार करके केवट न केवल खुद बाधा से पार हो गया, बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।
नारदपुराण में चरणामृत का महत्व इस तरह बताया गया है
पाप व्याधिविनाशार्थ विष्णुपादोदकौषधम्।
तुलसीदल सम्मिश्रं जलं सर्वपमात्रकम्।।
पाप और रोग दूर करने के लिए भगवान का चरणामृत एक दवा के समान है। यदि उसमें तुलसी के पत्ते भी मिला दिए जाएं, तो उसके गुण में और भी ज्यादा बढ़ोतरी हो जाती है।
चरणामृत पीते समय यहां बताया गया श्लोक पढ़ना चाहिए
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णुपदोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।।
यानी चरणामृत अकाल मृत्यु को दूर करता है। सभी तरह की बीमारियों का नाश करता है। इसके सेवन से पुर्नजन्म नहीं होता और भवबंधन कट जाते हैं।
इस तरह देखें तो भगवान का चरणामृत भक्तों के सभी तरह के दुख और रोगों का नाश होता है। इसलिए वे इसे ग्रहण कर खुद को धन्य समझते हैं।
जय श्री राम

भमावत 
थूर, उदयपुर , मेवाड़
मो. 0917891529862

बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

देसी गौ दूध

देसी गौ दूध : – गौदुग्ध को आहार शास्त्रियों ने सम्पूर्ण आहार माना है और पाया है। अनेक देशों की चिकित्सीय प्रयोगशालाओं में ये सिद्ध हुआ है कि यदि नवजात शिशु को माँ के दूध के अतिरिक्त देसी गाय का ही दूध पिलाया जाए तो यह उसके लिए बहुत लाभदायक है, देसी गाय का दूश अनेक प्रकार के कैंसर और एड्स जैसे जानलेवा रोगों का नाश करने की अद्भुत क्षमता रखता है, यदि मनुष्य केवल गाय के दूध का ही सेवन करता रहे तो उसका शरीर व जीवन न केवल सुचारू रूप से चलता रहेगा वरन् वह अन्य लोगों की अपेक्षा सशक्त और रोग प्रतिरोधक क्षमता से संपन्न हो जाएगा। मानव शरीर के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व इसमें होते हैं। गाय के एक पौण्ड दूध से इतनी शक्ति मिलती है, जितनी की 4 अण्डों और 250 ग्राम मांस से भी प्राप्त नहीं होती। देशी गाय के दूध में विटामिन ए-2 होता है जो कि कैंसरनाशक है, जबकि जर्सी(विदेशी) गाय के दूध में विटामिन ए-1 होता है जो कि कैंसरकारक है। भैंस के दूध की तुलना में भी गौदुग्ध अत्यन्त लाभकारी है।
दस्त या आंव हो जाने पर ठंडा गौदुग्ध(1 गिलास) में एक नींबू निचोडक़र तुरन्त पी जावें। चोट लगने आदि के कारण शरीर में कहीं दर्द हो तो गर्म दूध में हल्दी मिलाकर पीवें। टी.बी. के रोगी को गौदुग्ध पर्याप्त मात्रा में दोनों समय पिलाया जाना चाहिए।

भमावत 
थूर, उदयपुर , मेवाड़
मो. 0917891529862

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

कौन थे राजा वीर विक्रमादित्य..... ????

कौन थे राजा वीर विक्रमादित्य..... ????



 





(कुतुबमीनार-राजा विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया …. “”हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र”” है…)
बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था
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उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य...
बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली ,
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आज ये देश और यहाँ की संस्कृति केवल विक्रमदित्य के कारण अस्तित्व में है
अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था
भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था, देश में बौद्ध और जैन हो गए थे
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रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया
विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया
विक्रमदित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है
अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे
हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे,
उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , राज अपने छोटे भाई विक्रमदित्य को दे दिया , वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है
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महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया
उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है
विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे
भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे ।
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हिन्दू कैलंडर भी विक्रमदित्य का स्थापित किया हुआ है
आज जो भी ज्योतिष गणना है जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथीयाँ , राशि , नक्षत्र , गोचर आदि उन्ही की रचना है , वे बहुत ही पराक्रमी , बलशाली और बुद्धिमान राजा थे ।
कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे ,
विक्रमदित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था
विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी
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पर बड़े दुःख की बात है की भारत के सबसे महानतम राजा के बारे में अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम शासको के शासनकाल में लिखित इतिहास भारत की जनता को शून्य ज्ञान देता है, कृपया आप शेयर तो करें ताकि देश जान सके कि सोने की चिड़िया वाला देश का राजा कौन था ?
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जय हिन्द-वंदे मातरम् । —

भमावत 
थूर, उदयपुर , मेवाड़
मो. 0917891529862

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

आयुर्वेद

आयुर्वेद
हार्ट अटैक: ना घबराये ……!!!
सहज सुलभ उपाय ….
99 प्रतिशत ब्लॉकेज को भी रिमूव कर देता है पीपल
का पत्ता….
पीपल के 15 पत्ते लें जो कोमल गुलाबी कोंपलें न हों,
बल्कि पत्ते हरे, कोमल व भली प्रकार विकसित हों। प्रत्येक
का ऊपर व नीचे का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें।
पत्ते का बीच का भाग पानी से साफ कर लें। इन्हें एक गिलास
पानी में धीमी आँच पर पकने दें। जब पानी उबलकर एक तिहाई
रह जाए तब ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठंडे
स्थान पर रख दें, दवा तैयार।
इस काढ़े की तीन खुराकें बनाकर प्रत्येक तीन घंटे बाद
प्रातः लें। हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात
लगातार पंद्रह दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ
हो जाता है और फिर दिल का दौरा पड़ने
की संभावना नहीं रहती। दिल के रोगी इस नुस्खे का एक बार
प्रयोग अवश्य करें।
* पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अद्भुत
क्षमता है।
* इस पीपल के काढ़े की तीन खुराकें सवेरे 8 बजे, 11 बजे व
2 बजे ली जा सकती हैं।
* खुराक लेने से पहले पेट एक दम खाली नहीं होना चाहिए,
बल्कि सुपाच्य व हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें।
* प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें। मांस, मछली,
अंडे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें। नमक, चिकनाई
का प्रयोग बंद कर दें।
* अनार, पपीता, आंवला, बथुआ, लहसुन, मैथी दाना, सेब
का मुरब्बा, मौसंबी, रात में भिगोए काले चने, किशमिश,
गुग्गुल, दही, छाछ आदि लें । ……
तो अब समझ आया, भगवान ने पीपल के पत्तों को हार्टशेप क्यों बनाया.....?
किशन लाल डांगी
भमावत
थूर उदयपुर मेवाड़
मो 0917891529862

रविवार, 27 सितंबर 2015

अनेक सनातन धर्मावलम्बी सोमरस को अल्कोहल समझते है जब की वेदों में वर्णित सोमरस अल्कोहल नहीं है सोमरस को अल्कोहल कहने वाले महामूर्ख है ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्त 135 की ऋचा 1499 में स्पष्ट वर्णन है की सोमरस एक औषधि है जिसे पर्वतो से प्राप्त किया जाता था एवम् इसमें गऊ का दुग्ध जौ अदि मिला कर देवताओ को अर्पित किया जाता था अब आप ही बताये की दुनिया की कौन सी अल्कोहल पर्वतो से प्राप्त होती है और कौन सी अल्कोहल में गऊ का दुग्ध ,जौ ,दही अदि मिलाकर पिया जाता है अतः स्पस्ट है कि सोमरस एक औषधीय पेय है न की अल्कोहल ।


भमावत 
थूर, उदयपुर , मेवाड़
मो. 0917891529862

प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े फायद

14 प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े फायद
पुराने समय से बहुत सी परंपराएं प्रचलित हैं, जिनका पालन आज भी काफी लोग कर रहे हैं। ये परंपराएं धर्म से जुड़ी दिखाई देती हैं, लेकिन इनके वैज्ञानिक कारण भी हैं। जो लोग इन परंपराओं को अपने जीवन में उतारते हैं, वे स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियों से बचे रहते हैं। यहां जानिए ऐसी ही 14 खास परंपराएं, जिनका पालन अधिकतर परिवारों में किया जाता है…
1. एक ही गोत्र में शादी नहीं करना
Ancient Hindu Traditions & Benefits
कई शोधों में ये बात सामने आई है कि व्यक्ति को जेनेटिक बीमारी न हो इसके लिए एक इलाज है ‘सेपरेशन ऑफ़ जींस’, यानी अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नहीं करना चाहिए। रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नहीं हो पाते हैं और जींस से संबंधित बीमारियां जैसे कलर ब्लाईंडनेस आदि होने की संभावनाएं रहती हैं। संभवत: पुराने समय में ही जींस और डीएनए के बारे खोज कर ली गई थी और इसी कारण एक गोत्र में विवाह न करने की परंपरा बनाई गई।
2. चूड़ियों का महत्व
पुराने समय मे ज्यादातर महिलाये सोने-चांदी की चूड़ियाँ पहना करती थी माना जाता है की सोने-चांदी के घर्षण से शरीर को इनके शक्तिशाली तत्व प्राप्त होते हैं, जिससे महिलाओं को स्वास्थ्य लाभ मिलता है। महिलाये पुरुषों से कमजोर होती है | चूड़ियाँ उनके हाथो को मजबूत और शक्तिशाली बनती है
3. सिंदूर लगाना
Sindur Khela During Hindu Festival Durga Puja
Source
सिंदूर हल्दी, नींबू और पारा के मिश्रण से तैयार किया जाता है। सिंदूर महिला के रक्तचाप को नियंत्रित करने के अलावा उनकी सेक्सुअल ड्राइव को भी बढाता है। इसे उस जगह पर लगाया जाता है , जहां पर पिट्यूटरी ग्रंथि होती है, जहां पर सारे हार्मोन डेवलप होते हैं। इसके अलावा सिंदूर तनाव से भी महिलाओं को दूर रखता है।
4. बच्चों का कान छेदन
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विज्ञान कहता है कि कर्णभेद से मस्तिष्क में रक्त का संचार समुचित प्रकार से होता है। इससे बौद्घिक योग्यता बढ़ती है। और बच्चो के चेहरे पर चमक आती है | इसके कारण बच्चा बेहतर ज्ञान प्राप्त कर लेता है
5 पाव छूना और ज़मीन पर बैठ कर भोजन करना
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बड़ो ले चरण स्पर्श करने से रक्त पवाह सर की तरफ होता है और इस तरह से चरणर्-स्पश करने से अपने से बड़ों की विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा शक्ति हमारे शरीर को नयी ऊर्जा प्रदान कर ऊर्जावान, निरोगी और सकारात्मक विचारों से परिपूर्ण कर देती है। सुखासन से पूरे शरीर में रक्त-संचार समान रूप से होने लगता है। जिससे शरीर अधिक ऊर्जावान हो जाता है।तथा पृथ्वी की ऊर्जा भी भोजन के साथ हमतक पहुचती है।
6. हाथों में मेहंदी लगाना
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विज्ञान कहता है की मेंहदी बहुत ठंडी होती है इस लगाने से दिमाग ठंडा रहता है और तनाव भी कम होता है इसलिये शादी के दिन दुल्‍हने मेंहदी लगाती हैं, जिससे उन्‍हें शादी का तनाव ना हो पाए।
7. सर पे चोटी रखना
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सिर पर चोंटी रखने की परंपरा को हिन्दुत्व की पहचान तक माना जाता है । असल में जिस स्थान पर शिखा यानि कि चोंटी रखने की परंपरा है, वहा पर सिर के बीचों-बीच सुषुम्ना नाड़ी का स्थान होता है।सुषुम्रा नाड़ी इंसान के हर तरह के विकास में बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चोटी सुषुम्रा नाड़ी को हानिकारक प्रभावों से बचाती है
8. भोजन के अंत में मिठाई खाना
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जब हम कुछ मसालेदार भोजन खाते हैं, तो हमारे शरीर एसिड बने लगता है जिससे हमारा खाना पचता है और यह एसिड ज्यादा ना बने इसके लिए आखिर में मिठाई खाई जाती है जो पाचन प्रक्रिया शांत करती है।
9. तुलसी के पेड़ की क्यों पूजा होती है.
Tulsi
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तुलसी में विद्यमान रसायन वस्तुतः उतने ही गुणकारी हैं, जितना वर्णन शास्रों में किया गया है। यह कीटनाशक है, कीटप्रतिकारक तथा खतरनाक जीवाणुनाशक है। विशेषकर एनांफिलिस जाति के मच्छरों के विरुद्ध इसका कीटनाशी प्रभाव उल्लेखनीय है।
10. पीपल के वृक्ष की पूजा
piple
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पीपल की उपयोगिता और महत्ता वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों कारणों से है। यह वृक्ष अन्य वृक्षों की तुलना में वातावरण में ऑक्सीजन की अधिक-से-अधिक मात्रा में अभिवृद्धि करता है। यह प्रदूषित वायु को स्वच्छ करता है और आस-पास के वातावरण में सात्विकता की वृद्धि भी करता है। इसके संसर्ग में आते ही तन-मन स्वतः हर्षित और पुलकित हो जाता है। यही कारण है कि इस वृक्ष के नीचे ध्यान एवं मंत्र जप का विशेष महत्व है।


भमावत 
थूर, उदयपुर , मेवाड़
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